श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.20.36

दशम स्कन्ध · अध्याय 20 · अथ विंशोऽध्यायः

गिरयो मुमुचुस्तोयं क्वचिन्‍न मुमुचुः शिवम्।

यथा ज्ञानामृतं काले ज्ञानिनो ददते न वा॥ ३६

girayo mumucustoyaṃ kvacinna mumucuḥ śivam|

yathā jñānāmṛtaṃ kāle jñānino dadate na vā|| 36

अर्थ

अब पर्वतोंसे कहीं-कहीं झरने झरते थे और कहीं-कहीं वे अपने कल्याणकारी जलको नहीं भी बहाते थे—जैसे ज्ञानी पुरुष समयपर अपने अमृतमय ज्ञानका दान किसी अधिकारीको कर देते हैं और किसी-किसीको नहीं भी करते॥ ३६॥

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