॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 10.20.35
सर्वस्वं जलदा हित्वा विरेजुः शुभ्रवर्चसः।
यथा त्यक्तैषणाः शान्ता मुनयो मुक्तकिल्बिषाः॥ ३५
sarvasvaṃ jaladā hitvā virejuḥ śubhravarcasaḥ|
yathā tyaktaiṣaṇāḥ śāntā munayo muktakilbiṣāḥ|| 35
अर्थ
बादल अपने सर्वस्व जलका दान करके उज्ज्वल कान्तिसे सुशोभित होने लगे—ठीक वैसे ही, जैसे लोक-परलोक, स्त्री-पुत्र और धन-सम्पत्तिसम्बन्धी चिन्ता और कामनाओंका परित्याग कर देनेपर संसारके बन्धनसे छूटे हुए परम शान्त संन्यासी शोभायमान होते हैं॥ ३५॥