श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.20.38

दशम स्कन्ध · अध्याय 20 · अथ विंशोऽध्यायः

गाधवारिचरास्तापमविन्दञ्छरदर्कजम् ।

यथा दरिद्रः कृपणः कुटुम्ब्यविजितेन्द्रियः॥ ३८

gādhavāricarāstāpamavindañcharadarkajam |

yathā daridraḥ kṛpaṇaḥ kuṭumbyavijitendriyaḥ|| 38

अर्थ

थोड़े जलमें रहनेवाले प्राणियोंको शरत्कालीन सूर्यकी प्रखर किरणोंसे बड़ी पीड़ा होने लगी—जैसे अपनी इन्द्रियोंके वशमें रहनेवाले कृपण एवं दरिद्र कुटुम्बीको तरह-तरहके ताप सताते ही रहते हैं॥ ३८॥

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