श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.20.14

दशम स्कन्ध · अध्याय 20 · अथ विंशोऽध्यायः

सरिद्भिः संगतः सिन्धुश्‍चुक्षुभे श्‍वसनोर्मिमान्।

अपक्वयोगिनश्‍चित्तं कामाक्तं गुणयुग् यथा॥ १४

saridbhiḥ saṃgataḥ sindhuścukṣubhe śvasanormimān|

apakvayoginaścittaṃ kāmāktaṃ guṇayug yathā|| 14

अर्थ

वर्षा-ऋतुमें हवाके झोकोंसे समुद्र एक तो यों ही उत्ताल तरंगोंसे युक्त हो रहा था, अब नदियोंके संयोगसे वह और भी क्षुब्ध हो उठा—ठीक वैसे ही जैसे वासनायुक्त योगीका चित्त विषयोंका सम्पर्क होनेपर कामनाओंके उभारसे भर जाता है॥ १४॥✎ 1664

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
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