श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.20.13

दशम स्कन्ध · अध्याय 20 · अथ विंशोऽध्यायः

जलस्थलौकसः सर्वे नववारिनिषेवया।

अबिभ्रद् रुचिरं रूपं यथा हरिनिषेवया॥ १३

jalasthalaukasaḥ sarve navavāriniṣevayā|

abibhrad ruciraṃ rūpaṃ yathā hariniṣevayā|| 13

अर्थ

नये बरसाती जलके सेवनसे सभी जलचर और थलचर प्राणियोंकी सुन्दरता बढ़ गयी थी, जैसे भगवान्‌की सेवा करनेसे बाहर और भीतरके दोनों ही रूप सुघड़ हो जाते हैं॥ १३॥✎ 1664

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1664 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: आदेशा-नुसार → आदेशानुसार

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