श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.20.12

दशम स्कन्ध · अध्याय 20 · अथ विंशोऽध्यायः

क्षेत्राणि सस्यसम्पद्भिः२ कर्षकाणां मुदं ददुः।

धनिनामुपतापं च दैवाधीनमजानताम्॥ १२

kṣetrāṇi sasyasampadbhiḥ karṣakāṇāṃ mudaṃ daduḥ|

dhanināmupatāpaṃ ca daivādhīnamajānatām|| 12

अर्थ

सब खेत अनाजोंसे भरे-पूरे लहलहा रहे थे। उन्हें देखकर किसान तो मारे आनन्दके फूले न समाते थे, परन्तु सब कुछ प्रारब्धके अधीन है—यह बात न जाननेवाले धनियोंके चित्तमें बड़ी जलन हो रही थी कि अब हम इन्हें अपने पंजेमें कैसे रख सकेंगे॥ १२॥✎ 1664

टिप्पणियाँ

  1. २

    सस्यवृद्धानि।

    (मुद्रित पृष्ठ 260)
इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1664 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: आदेशा-नुसार → आदेशानुसार

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