मूसलधार वर्षाकी चोट खाते रहनेपर भी पर्वतोंको कोई व्यथा नहीं होती थी—जैसे दुःखोंकी भरमार होनेपर भी उन पुरुषोंको किसी प्रकारकी व्यथा नहीं होती, जिन्होंने अपना चित्त भगवान्को ही समर्पित कर रखा है॥ १५॥✎ 1664
गिरयो वर्षधाराभिर्हन्यमाना न विव्यथुः।
अभिभूयमाना व्यसनैर्यथाधोक्षजचेतसः॥ १५
मूसलधार वर्षाकी चोट खाते रहनेपर भी पर्वतोंको कोई व्यथा नहीं होती थी—जैसे दुःखोंकी भरमार होनेपर भी उन पुरुषोंको किसी प्रकारकी व्यथा नहीं होती, जिन्होंने अपना चित्त भगवान्को ही समर्पित कर रखा है॥ १५॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.20.15 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 260) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/20/15/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)