श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.2.33

दशम स्कन्ध · अध्याय 2 · अथ द्वितीयोऽध्यायः

तथा न ते माधव तावकाः क्वचिद्

भ्रश्यन्ति मार्गात्त्वयि बद्धसौहृदाः।

त्वयाभिगुप्ता विचरन्ति निर्भया

विनायकानीकपमूर्धसु प्रभो॥ ३३

tathā na te mādhava tāvakāḥ kvacid

bhraśyanti mārgāttvayi baddhasauhṛdāḥ|

tvayābhiguptā vicaranti nirbhayā

vināyakānīkapamūrdhasu prabho|| 33

अर्थ

परन्तु भगवन्! जो आपके अपने निज जन हैं, जिन्होंने आपके चरणोंमें अपनी सच्ची प्रीति जोड़ रखी है, वे कभी उन ज्ञानाभिमानियोंकी भाँति अपने साधन-मार्गसे गिरते नहीं। प्रभो! वे बड़े-बड़े विघ्न डालनेवालोंकी सेनाके सरदारोंके सिरपर पैर रखकर निर्भय विचरते हैं, कोई भी विघ्न उनके मार्गमें रुकावट नहीं डाल सकते; क्योंकि उनके रक्षक आप जो हैं॥ ३३॥

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