॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 10.2.32
येऽन्येऽरविन्दाक्ष विमुक्तमानिन-
स्त्वय्यस्तभावादविशुद्धबुद्धयः ।
आरुह्य कृच्छ्रेण परं पदं ततः
पतन्त्यधोऽनादृतयुष्मदङ्घ्रयः ॥ ३२
ye'nye'ravindākṣa vimuktamānina-
stvayyastabhāvādaviśuddhabuddhayaḥ |
āruhya kṛcchreṇa paraṃ padaṃ tataḥ
patantyadho'nādṛtayuṣmadaṅghrayaḥ || 32
अर्थ
कमलनयन! जो लोग आपके चरणकमलोंकी शरण नहीं लेते तथा आपके प्रति भक्तिभावसे रहित होनेके कारण जिनकी बुद्धि भी शुद्ध नहीं है, वे अपनेको झूठ-मूठ मुक्त मानते हैं। वास्तवमें तो वे बद्ध ही हैं। वे यदि बड़ी तपस्या और साधनाका कष्ट उठाकर किसी प्रकार ऊँचे-से-ऊँचे पदपर भी पहुँच जायँ, तो भी वहाँसे नीचे गिर जाते हैं॥ ३२॥