श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.2.31

दशम स्कन्ध · अध्याय 2 · अथ द्वितीयोऽध्यायः

स्वयं समुत्तीर्य सुदुस्तरं द्युमन्

भवार्णवं भीममदभ्रसौहृदाः।

भवत्पदाम्भोरुहनावमत्र ते

निधाय याताः सदनुग्रहो भवान्॥ ३१

svayaṃ samuttīrya sudustaraṃ dyuman

bhavārṇavaṃ bhīmamadabhrasauhṛdāḥ|

bhavatpadāmbhoruhanāvamatra te

nidhāya yātāḥ sadanugraho bhavān|| 31

अर्थ

परम प्रकाशस्वरूप परमात्मन्! आपके भक्तजन सारे जगत‍्के निष्कपट प्रेमी, सच्चे हितैषी होते हैं। वे स्वयं तो इस भयंकर और कष्टसे पार करनेयोग्य संसारसागरको पार कर ही जाते हैं, किन्तु औरोंके कल्याणके लिये भी वे यहाँ आपके चरण-कमलोंकी नौका स्थापित कर जाते हैं। वास्तवमें सत्पुरुषोंपर आपकी महान् कृपा है। उनके लिये आप अनुग्रहस्वरूप ही हैं॥ ३१॥

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