॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 10.2.34
सत्त्वं विशुद्धं श्रयते भवान् स्थितौ
शरीरिणां श्रेय उपायनं वपुः।
वेदक्रियायोगतपःसमाधिभि-
स्तवार्हणं येन जनः समीहते॥ ३४
sattvaṃ viśuddhaṃ śrayate bhavān sthitau
śarīriṇāṃ śreya upāyanaṃ vapuḥ|
vedakriyāyogatapaḥsamādhibhi-
stavārhaṇaṃ yena janaḥ samīhate|| 34
अर्थ
आप संसारकी स्थितिके लिये समस्त देहधारियोंको परम कल्याण प्रदान करनेवाला विशुद्ध सत्त्वमय, सच्चिदानन्दमय परम दिव्य मंगल-विग्रह प्रकट करते हैं। उस रूपके प्रकट होनेसे ही आपके भक्त वेद, कर्मकाण्ड, अष्टांगयोग, तपस्या और समाधिके द्वारा आपकी आराधना करते हैं। बिना किसी आश्रयके वे किसकी आराधना करेंगे?॥ ३४॥