श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.2.24

दशम स्कन्ध · अध्याय 2 · अथ द्वितीयोऽध्यायः

आसीनः संविशंस्तिष्ठन् भुंजानः पर्यटन्१ महीम्।

चिन्तयानो हृषीकेशमपश्यत् तन्मयं जगत्॥ २४

āsīnaḥ saṃviśaṃstiṣṭhan bhuṃjānaḥ paryaṭan mahīm|

cintayāno hṛṣīkeśamapaśyat tanmayaṃ jagat|| 24

अर्थ

वह उठते-बैठते, खाते-पीते, सोते-जागते और चलते-फिरते—सर्वदा ही श्रीकृष्णके चिन्तनमें लगा रहता। जहाँ उसकी आँख पड़ती, जहाँ कुछ खड़का होता, वहाँ उसे श्रीकृष्ण दीख जाते। इस प्रकार उसे सारा जगत् ही श्रीकृष्णमय दीखने लगा॥ २४॥

टिप्पणियाँ

  1. १

    टन् पिबन्।

    (मुद्रित पृष्ठ 131)

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