श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.2.23

दशम स्कन्ध · अध्याय 2 · अथ द्वितीयोऽध्यायः

इति घोरतमाद् भावात् सन्‍निवृत्तः स्वयं प्रभुः।

आस्ते प्रतीक्षंस्तज्जन्म हरेर्वैरानुबन्धकृत्॥ २३

iti ghoratamād bhāvāt sannivṛttaḥ svayaṃ prabhuḥ|

āste pratīkṣaṃstajjanma harervairānubandhakṛt|| 23

अर्थ

यद्यपि कंस देवकीको मार सकता था, किन्तु स्वयं ही वह इस अत्यन्त क्रूरताके विचारसे निवृत्त हो गया।* अब भगवान्‌के प्रति दृढ़ वैरका भाव मनमें गाँठकर उनके जन्मकी प्रतीक्षा करने लगा॥ २३॥

टिप्पणियाँ

  1. *

    जो कंस विवाहके मंगलचिह्नोंको धारण की हुई देवकीका गला काटनेके उद्योगसे न हिचका, वही आज इतना सद्-विचारवान् हो गया, इसका क्या कारण है? अवश्य ही आज वह जिस देवकीको देख रहा है, उसके अन्तरंगमें—गर्भमें श्रीभगवान् हैं। जिसके भीतर भगवान् हैं, उसके दर्शनसे सद्बुद्धिका उदय होना कोई आश्‍चर्य नहीं है।

    (मुद्रित पृष्ठ 131)

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें