श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.2.25

दशम स्कन्ध · अध्याय 2 · अथ द्वितीयोऽध्यायः

ब्रह्मा भवश्‍च तत्रैत्य मुनिभिर्नारदादिभिः।

देवैः२ सानुचरैः साकं गीर्भिर्वृषणमैडयन्॥ २५

brahmā bhavaśca tatraitya munibhirnāradādibhiḥ|

devaiḥ sānucaraiḥ sākaṃ gīrbhirvṛṣaṇamaiḍayan|| 25

अर्थ

परीक्षित्! भगवान् शंकर और ब्रह्माजी कंसके कैदखानेमें आये। उनके साथ अपने अनुचरोंके सहित समस्त देवता और नारदादि ऋषि भी थे। वे लोग सुमधुर वचनोंसे सबकी अभिलाषा पूर्ण करनेवाले श्रीहरिकी इस प्रकार स्तुति करने लगे॥ २५॥

टिप्पणियाँ

  1. २

    देवाः सानुचराः।

     

    (मुद्रित पृष्ठ 131)

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