श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.17.8

दशम स्कन्ध · अध्याय 17 · अथ सप्तदशोऽध्यायः

सुपर्णपक्षाभिहतः कालियोऽतीव विह्वलः।

ह्रदं विवेश कालिन्द्यास्तदगम्यं दुरासदम्॥ ८✎ 1147

suparṇapakṣābhihataḥ kāliyo'tīva vihvalaḥ|

hradaṃ viveśa kālindyāstadagamyaṃ durāsadam|| 8

अर्थ

उनके पंखकी चोटसे कालिय नाग घायल हो गया। वह घबड़ाकर वहाँसे भगा और यमुनाजीके इस कुण्डमें चला आया। यमुनाजीका यह कुण्ड गरुडके लिये अगम्य था। साथ ही वह इतना गहरा था कि उसमें दूसरे लोग भी नहीं जा सकते थे॥ ८॥

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1147 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): हृदं → ह्रदं

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