॥ श्रीहरिः ॥
तत्रैकदा जलचरं गरुडो भक्ष्यमीप्सितम्।
निवारितः सौभरिणा प्रसह्य क्षुधितोऽहरत्॥ ९
tatraikadā jalacaraṃ garuḍo bhakṣyamīpsitam|
nivāritaḥ saubhariṇā prasahya kṣudhito'harat|| 9
अर्थ
इसी स्थानपर एक दिन क्षुधातुर गरुडने तपस्वी सौभरिके मना करनेपर भी अपने अभीष्ट भक्ष्य मत्स्यको बलपूर्वक पकड़कर खा लिया॥ ९॥
तत्रैकदा जलचरं गरुडो भक्ष्यमीप्सितम्।
निवारितः सौभरिणा प्रसह्य क्षुधितोऽहरत्॥ ९
इसी स्थानपर एक दिन क्षुधातुर गरुडने तपस्वी सौभरिके मना करनेपर भी अपने अभीष्ट भक्ष्य मत्स्यको बलपूर्वक पकड़कर खा लिया॥ ९॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.17.9 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 250) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/17/9/