श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.14.53

दशम स्कन्ध · अध्याय 14 · अथ चतुर्दशोऽध्यायः

देहोऽपि ममताभाक् चेत्तर्ह्यसौ नात्मवत् प्रियः।

यज्जीर्यत्यपि देहेऽस्मिन् जीविताशा बलीयसी॥ ५३

deho'pi mamatābhāk cettarhyasau nātmavat priyaḥ|

yajjīryatyapi dehe'smin jīvitāśā balīyasī|| 53

अर्थ

जब विचारके द्वारा यह मालूम हो जाता है कि ‘यह शरीर मैं नहीं हूँ, यह शरीर मेरा है’ तब इस शरीरसे भी आत्माके समान प्रेम नहीं रहता। यही कारण है कि इस देहके जीर्ण-शीर्ण हो जानेपर भी जीनेकी आशा प्रबल रूपसे बनी रहती है॥ ५३॥

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