॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 10.14.52
देहात्मवादिनां पुंसामपि राजन्यसत्तम।
यथा देहः प्रियतमस्तथा न ह्यनु ये च तम्॥ ५२
dehātmavādināṃ puṃsāmapi rājanyasattama|
yathā dehaḥ priyatamastathā na hyanu ye ca tam|| 52
अर्थ
नृपश्रेष्ठ! जो लोग देहको ही आत्मा मानते हैं, वे भी अपने शरीरसे जितना प्रेम करते हैं, उतना प्रेम शरीरके सम्बन्धी पुत्र-मित्र आदिसे नहीं करते॥ ५२॥