श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.14.17

दशम स्कन्ध · अध्याय 14 · अथ चतुर्दशोऽध्यायः

यस्य कुक्षाविदं सर्वं सात्मं भाति यथा तथा।

तत्त्वय्यपीह तत् सर्वं किमिदं मायया विना॥ १७

yasya kukṣāvidaṃ sarvaṃ sātmaṃ bhāti yathā tathā|

tattvayyapīha tat sarvaṃ kimidaṃ māyayā vinā|| 17

अर्थ

जब आपके सहित यह सम्पूर्ण विश्‍व जैसा बाहर दीखता है वैसा ही आपके उदरमें भी दीखा, तब क्या यह सब आपकी मायाके बिना ही आपमें प्रतीत हुआ? अवश्य ही आपकी लीला है॥ १७॥✎ 1421

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1421 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): छड़ी-छींके → छड़ी-छीके

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