श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.13.22

दशम स्कन्ध · अध्याय 13 · अथ त्रयोदशोऽध्यायः

तन्मातरो वेणुरवत्वरोत्थिता

उत्थाप्य दोर्भिः परिरभ्य निर्भरम्।

स्नेहस्नुतस्तन्यपयःसुधासवं

मत्वा परं ब्रह्म सुतानपाययन्॥ २२

tanmātaro veṇuravatvarotthitā

utthāpya dorbhiḥ parirabhya nirbharam|

snehasnutastanyapayaḥsudhāsavaṃ

matvā paraṃ brahma sutānapāyayan|| 22

अर्थ

ग्वालबालोंकी माताएँ बाँसुरीकी तान सुनते ही जल्दीसे दौड़ आयीं। ग्वालबाल बने हुए परब्रह्म श्रीकृष्णको अपने बच्चे समझकर हाथोंसे उठाकर उन्होंने जोरसे हृदयसे लगा लिया। वे अपने स्तनोंसे वात्सल्य-स्नेहकी अधिकताके कारण सुधासे भी मधुर और आसवसे भी मादक चुचुआता हुआ दूध उन्हें पिलाने लगीं॥ २२॥✎ 1927

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1927 मुद्रणकी अपनी भूल (गीताप्रेसके पुराने संस्करणों और ग्रन्थकी अपनी गणनासे): व्रज-वासियोंकी → व्रजवासियोंकी

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