॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 10.13.23
ततो नृपोन्मर्दनमज्जलेपना-
लंकाररक्षातिलकाशनादिभिः ।
संलालितः स्वाचरितैः प्रहर्षयन्
सायं गतो यामयमेन माधवः॥ २३
tato nṛponmardanamajjalepanā-
laṃkārarakṣātilakāśanādibhiḥ |
saṃlālitaḥ svācaritaiḥ praharṣayan
sāyaṃ gato yāmayamena mādhavaḥ|| 23
अर्थ
परीक्षित्! इसी प्रकार प्रतिदिन सन्ध्यासमय भगवान् श्रीकृष्ण उन ग्वालबालोंके रूपमें वनसे लौट आते और अपनी बालसुलभ लीलाओंसे माताओंको आनन्दित करते। वे माताएँ उन्हें उबटन लगातीं, नहलातीं, चन्दनका लेप करतीं और अच्छे-अच्छे वस्त्रों तथा गहनोंसे सजातीं। दोनों भौंहोंके बीचमें डीठसे बचानेके लिये काजलका डिठौना लगा देतीं तथा भोजन करातीं और तरह-तरहसे बड़े लाड़-प्यारसे उनका लालन-पालन करतीं॥ २३॥✎ 1927