श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.12.10

दशम स्कन्ध · अध्याय 12 · अथ द्वादशोऽध्यायः

साकं भेकैर्विलंघन्तः सरित्प्रस्रवसम्प्लुताः।

विहसन्तः प्रतिच्छायाः शपन्तश्‍च प्रतिस्वनान्॥ १०

sākaṃ bhekairvilaṃghantaḥ saritprasravasamplutāḥ|

vihasantaḥ praticchāyāḥ śapantaśca pratisvanān|| 10

अर्थ

बहुत-से ग्वालबाल तो नदीके कछारमें छपका खेल रहे हैं और उसमें फुदकते हुए मेढकोंके साथ स्वयं भी फुदक रहे हैं। कोई पानीमें अपनी परछाईं देखकर उसकी हँसी कर रहे हैं, तो दूसरे अपने शब्दकी प्रतिध्वनिको ही बुरा-भला कह रहे हैं॥ १०॥✎ 1414 1415

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #1414 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): छींका → छीका
  • #1415 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): छींके, → छीके,

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