श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.11.20

दशम स्कन्ध · अध्याय 11 · अथैकादशोऽध्यायः

इत्थं यशोदा तमशेषशेखरं

मत्वा सुतं स्नेहनिबद्धधीर्नृप।

हस्ते गृहीत्वा सहराममच्युतं

नीत्वा स्ववाटं कृतवत्यथोदयम्॥ २०

itthaṃ yaśodā tamaśeṣaśekharaṃ

matvā sutaṃ snehanibaddhadhīrnṛpa|

haste gṛhītvā saharāmamacyutaṃ

nītvā svavāṭaṃ kṛtavatyathodayam|| 20

अर्थ

परीक्षित्! माता यशोदाका सम्पूर्ण मन-प्राण प्रेम-बन्धनसे बँधा हुआ था। वे चराचर जगत‍्के शिरोमणि भगवान्‌को अपना पुत्र समझतीं और इस प्रकार कहकर एक हाथसे बलराम तथा दूसरे हाथसे श्रीकृष्णको पकड़कर अपने घर ले आयीं। इसके बाद उन्होंने पुत्रके मंगलके लिये जो कुछ करना था, वह बड़े प्रेमसे किया॥ २०॥✎ 1413

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1413 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): माँका → माका

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