परीक्षित्! माता यशोदाका सम्पूर्ण मन-प्राण प्रेम-बन्धनसे बँधा हुआ था। वे चराचर जगत्के शिरोमणि भगवान्को अपना पुत्र समझतीं और इस प्रकार कहकर एक हाथसे बलराम तथा दूसरे हाथसे श्रीकृष्णको पकड़कर अपने घर ले आयीं। इसके बाद उन्होंने पुत्रके मंगलके लिये जो कुछ करना था, वह बड़े प्रेमसे किया॥ २०॥✎ 1413
इत्थं यशोदा तमशेषशेखरं
मत्वा सुतं स्नेहनिबद्धधीर्नृप।
हस्ते गृहीत्वा सहराममच्युतं
नीत्वा स्ववाटं कृतवत्यथोदयम्॥ २०
परीक्षित्! माता यशोदाका सम्पूर्ण मन-प्राण प्रेम-बन्धनसे बँधा हुआ था। वे चराचर जगत्के शिरोमणि भगवान्को अपना पुत्र समझतीं और इस प्रकार कहकर एक हाथसे बलराम तथा दूसरे हाथसे श्रीकृष्णको पकड़कर अपने घर ले आयीं। इसके बाद उन्होंने पुत्रके मंगलके लिये जो कुछ करना था, वह बड़े प्रेमसे किया॥ २०॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.11.20 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 198) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/11/20/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)