॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 10.10.14
यथा कण्टकविद्धांगो जन्तोर्नेच्छति तां व्यथाम्।
जीवसाम्यं गतो लिङ्गैर्न तथाविद्धकण्टकः॥ १४
yathā kaṇṭakaviddhāṃgo jantornecchati tāṃ vyathām|
jīvasāmyaṃ gato liṅgairna tathāviddhakaṇṭakaḥ|| 14
अर्थ
जिसके शरीरमें एक बार काँटा गड़ जाता है, वह नहीं चाहता कि किसी भी प्राणीको काँटा गड़नेकी पीड़ा सहनी पड़े; क्योंकि उस पीड़ा और उसके द्वारा होनेवाले विकारोंसे वह समझता है कि दूसरेको भी वैसी ही पीड़ा होती है । परन्तु जिसे कभी काँटा गड़ा ही नहीं, वह उसकी पीड़ाका अनुमान नहीं कर सकता॥ १४॥