श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.10.15

दशम स्कन्ध · अध्याय 10 · अथ दशमोऽध्यायः

दरिद्रो निरहंस्तम्भो मुक्तः सर्वमदैरिह।

कृच्छ्रं यदृच्छयाऽऽप्नोति तद्धि तस्य परं तपः॥ १५

daridro nirahaṃstambho muktaḥ sarvamadairiha|

kṛcchraṃ yadṛcchayā''pnoti taddhi tasya paraṃ tapaḥ|| 15

अर्थ

दरिद्रमें घमंड और हेकड़ी नहीं होती; वह सब तरहके मदोंसे बचा रहता है। बल्कि दैववश उसे जो कष्ट उठाना पड़ता है, वह उसके लिये एक बहुत बड़ी तपस्या भी है॥ १५॥

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