श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.10.13

दशम स्कन्ध · अध्याय 10 · अथ दशमोऽध्यायः

असतः श्रीमदान्धस्य दारिद्र्यं परमञ्जनम्।✎ 2064

आत्मौपम्येन भूतानि दरिद्रः परमीक्षते॥ १३

asataḥ śrīmadāndhasya dāridryaṃ paramañjanam|

ātmaupamyena bhūtāni daridraḥ paramīkṣate|| 13

अर्थ

जो दुष्ट श्रीमदसे अंधे हो रहे हैं, उनकी आँखोंमें ज्योति डालनेके लिये दरिद्रता ही सबसे बड़ा अंजन है; क्योंकि दरिद्र यह देख सकता है कि दूसरे प्राणी भी मेरे ही जैसे हैं॥ १३॥

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #2064 यूनिकोड-रूप (अक्षर वही): दारिद्रॺं पर → दारिद्र्यं पर

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