श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 1.9.47

प्रथम स्कन्ध · अध्याय 9 · अथ नवमोऽध्यायः

तुष्टुवुर्मुनयो हृष्टाः कृष्णं तद‍्गुह्यनामभिः।

ततस्ते कृष्णहृदयाः स्वाश्रमान् प्रययुः पुनः॥ ४७

tuṣṭuvurmunayo hṛṣṭāḥ kṛṣṇaṃ tadguhyanāmabhiḥ|

tataste kṛṣṇahṛdayāḥ svāśramān prayayuḥ punaḥ|| 47

अर्थ

उस समय मुनियोंने बड़े आनन्दसे भगवान् श्रीकृष्णकी उनके रहस्यमय नाम ले-लेकर स्तुति की। इसके पश्चात् अपने हृदयोंको श्रीकृष्णमय बनाकर वे अपने-अपने आश्रमोंको लौट गये॥ ४७॥✎ 74

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #74 शब्दोंके बीचका स्थान: ४५॥शौनकजी! → ४५॥ शौनकजी!

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