श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 1.8.51

प्रथम स्कन्ध · अध्याय 8 · अथाष्टमोऽध्यायः

स्त्रीणां मद्धतबन्धूनां द्रोहो योऽसाविहोत्थितः।

कर्मभिर्गृहमेधीयैर्नाहं कल्पो व्यपोहितुम्॥ ५१

strīṇāṃ maddhatabandhūnāṃ droho yo'sāvihotthitaḥ|

karmabhirgṛhamedhīyairnāhaṃ kalpo vyapohitum|| 51

अर्थ

स्त्रियोंके पति और भाई-बन्धुओंको मारनेसे उनका मेरे द्वारा यहाँ जो अपराध हुआ है। उसका मैं गृहस्थोचित यज्ञ-यागादिकोंके द्वारा मार्जन करनेमें समर्थ नहीं हूँ॥ ५१॥✎ 70 71

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #70 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #71 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

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