यद्यपि शास्त्रका वचन है कि राजा यदि प्रजाका पालन करनेके लिये धर्मयुद्धमें शत्रुओंको मारे तो उसे पाप नहीं लगता, फिर भी इससे मुझे संतोष नहीं होता॥ ५०॥✎ 7071
नैनो राज्ञः प्रजाभर्तुर्धर्मयुद्धे वधो द्विषाम्।
इति मे न तु बोधाय कल्पते शासनं वचः॥ ५०
यद्यपि शास्त्रका वचन है कि राजा यदि प्रजाका पालन करनेके लिये धर्मयुद्धमें शत्रुओंको मारे तो उसे पाप नहीं लगता, फिर भी इससे मुझे संतोष नहीं होता॥ ५०॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 1.8.50 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 119) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/1/8/50/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)