bhūtahatyāṃ tathaivaikāṃ na yajñairmārṣṭumarhati|| 52
अर्थ
जैसे कीचड़से गँदला जल स्वच्छ नहीं किया जा सकता, मदिरासे मदिराकी अपवित्रता नहीं मिटायी जा सकती, वैसे ही बहुत-से हिंसाबहुल यज्ञोंके द्वारा एक भी प्राणीकी हत्याका प्रायश्चित्त नहीं किया जा सकता॥ ५२॥✎ 7071
यथा पङ्केन पङ्काम्भः सुरया वा सुराकृतम्।
भूतहत्यां तथैवैकां न यज्ञैर्मार्ष्टुमर्हति॥ ५२
जैसे कीचड़से गँदला जल स्वच्छ नहीं किया जा सकता, मदिरासे मदिराकी अपवित्रता नहीं मिटायी जा सकती, वैसे ही बहुत-से हिंसाबहुल यज्ञोंके द्वारा एक भी प्राणीकी हत्याका प्रायश्चित्त नहीं किया जा सकता॥ ५२॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 1.8.52 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 119) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/1/8/52/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)