॥ श्रीहरिः ॥
अर्जुनः सहसाऽऽज्ञाय२ हरेर्हार्दमथासिना।
मणिं जहार मूर्धन्यं द्विजस्य सहमूर्धजम्॥ ५५
arjunaḥ sahasā''jñāya harerhārdamathāsinā|
maṇiṃ jahāra mūrdhanyaṃ dvijasya sahamūrdhajam|| 55
अर्थ
सूतजी कहते हैं—अर्जुन भगवान्के हृदयकी बात तुरंत ताड़ गये और उन्होंने अपनी तलवारसे अश्वत्थामाके सिरकी मणि उसके बालोंके साथ उतार ली॥ ५५॥
अर्जुनः सहसाऽऽज्ञाय हरेर्हार्दमथासिना।
मणिं जहार मूर्धन्यं द्विजस्य सहमूर्धजम्॥ ५५
सूतजी कहते हैं—अर्जुन भगवान्के हृदयकी बात तुरंत ताड़ गये और उन्होंने अपनी तलवारसे अश्वत्थामाके सिरकी मणि उसके बालोंके साथ उतार ली॥ ५५॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 1.7.55 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 112) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/1/7/55/टिप्पणियाँ
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प्रा० पा०—सहसा ज्ञात्वा।
(मुद्रित पृष्ठ 112)