श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 1.7.48

प्रथम स्कन्ध · अध्याय 7 · अथ सप्तमोऽध्यायः

यैः कोपितं ब्रह्मकुलं राजन्यैरजितात्मभिः।

तत् कुलं प्रदहत्याशु सानुबन्धं शुचार्पितम्॥ ४८

yaiḥ kopitaṃ brahmakulaṃ rājanyairajitātmabhiḥ|

tat kulaṃ pradahatyāśu sānubandhaṃ śucārpitam|| 48

अर्थ

जो उच्छृंखल राजा अपने कुकृत्योंसे ब्राह्मणकुलको कुपित कर देते हैं, वह कुपित ब्राह्मणकुल उन राजाओंको सपरिवार शोकाग्‍निमें डालकर शीघ्र ही भस्म कर देता है’॥ ४८॥

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