सूतजीने कहा—शौनकादि ऋषियो! द्रौपदीकी बात धर्म और न्यायके अनुकूल थी। उसमें कपट नहीं था, करुणा और समता थी। अतएव राजा युधिष्ठिरने रानीके इन हितभरे श्रेष्ठ वचनोंका अभिनन्दन किया॥ ४९॥
धर्म्यं न्याय्यं सकरुणं निर्व्यलीकं समं महत्।
राजा धर्मसुतो राज्ञ्याः प्रत्यनन्दद्वचो द्विजाः॥ ४९
सूतजीने कहा—शौनकादि ऋषियो! द्रौपदीकी बात धर्म और न्यायके अनुकूल थी। उसमें कपट नहीं था, करुणा और समता थी। अतएव राजा युधिष्ठिरने रानीके इन हितभरे श्रेष्ठ वचनोंका अभिनन्दन किया॥ ४९॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 1.7.49 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 112) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/1/7/49/