श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 1.7.47

प्रथम स्कन्ध · अध्याय 7 · अथ सप्तमोऽध्यायः

मा रोदीदस्य जननी गौतमी पतिदेवता।

यथाहं मृतवत्साऽऽर्ता रोदिम्यश्रुमुखी मुहुः॥ ४७

mā rodīdasya jananī gautamī patidevatā|

yathāhaṃ mṛtavatsā''rtā rodimyaśrumukhī muhuḥ|| 47

अर्थ

जैसे अपने बच्चोंके मर जानेसे मैं दुःखी होकर रो रही हूँ और मेरी आँखोंसे बार-बार आँसू निकल रहे हैं, वैसे ही इनकी माता पतिव्रता गौतमी न रोयें॥ ४७॥

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