श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 1.7.40

प्रथम स्कन्ध · अध्याय 7 · अथ सप्तमोऽध्यायः

एवं परीक्षता धर्मं पार्थः कृष्णेन चोदितः।

नैच्छद्धन्तुं गुरुसुतं यद्यप्यात्महनं महान्॥ ४०

evaṃ parīkṣatā dharmaṃ pārthaḥ kṛṣṇena coditaḥ|

naicchaddhantuṃ gurusutaṃ yadyapyātmahanaṃ mahān|| 40

अर्थ

भगवान् श्रीकृष्णने अर्जुनके धर्मकी परीक्षा लेनेके लिये इस प्रकार प्रेरणा की, परन्तु अर्जुनका हृदय महान् था। यद्यपि अश्‍वत्थामाने उनके पुत्रोंकी हत्या की थी, फिर भी अर्जुनके मनमें गुरुपुत्रको मारनेकी इच्छा नहीं हुई ॥ ४०॥✎ 66 67 68

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (3)
  • #66 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #67 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #68 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

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