श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 1.7.39

प्रथम स्कन्ध · अध्याय 7 · अथ सप्तमोऽध्यायः

तदसौ वध्यतां पाप आतताय्यात्मबन्धुहा।

भर्तुश्‍च विप्रियं वीर कृतवान् कुलपांसनः॥ ३९

tadasau vadhyatāṃ pāpa ātatāyyātmabandhuhā|

bhartuśca vipriyaṃ vīra kṛtavān kulapāṃsanaḥ|| 39

अर्थ

इस पापी कुलांगार आततायीने तुम्हारे पुत्रोंका वध किया है और अपने स्वामी दुर्योधनको भी दुःख पहुँचाया है। इसलिये अर्जुन! इसे मार ही डालो॥ ३९॥✎ 66 67 68

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (3)
  • #66 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #67 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #68 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

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