श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 1.2.23

प्रथम स्कन्ध · अध्याय 2 · अथ द्वितीयोऽध्यायः

सत्त्वं रजस्तम इति प्रकृतेर्गुणास्तैर्युक्तः परः पुरुष एक इहास्य धत्ते।✎ 1504

स्थित्यादये हरिविरिञ्चिहरेति संज्ञाः श्रेयांसि तत्र खलु सत्त्वतनोर्नृणां स्युः॥ २३

sattvaṃ rajastama iti prakṛterguṇāstairyuktaḥ paraḥ puruṣa eka ihāsya dhatte|

sthityādaye hariviriñcihareti saṃjñāḥ śreyāṃsi tatra khalu sattvatanornṛṇāṃ syuḥ|| 23

अर्थ

प्रकृतिके तीन गुण हैं—सत्त्व, रज और तम। इनको स्वीकार करके इस संसारकी स्थिति, उत्पत्ति और प्रलयके लिये एक अद्वितीय परमात्मा ही विष्णु, ब्रह्मा और रुद्र—ये तीन नाम ग्रहण करते हैं। फिर भी मनुष्योंका परम कल्याण तो सत्त्वगुण स्वीकार करनेवाले श्रीहरिसे ही होता है॥ २३॥

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1504 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: प्रकृतेर्गुणास्तै- र्युक्त: → प्रकृतेर्गुणास्तैर्युक्तः

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