इसीसे बुद्धिमान् लोग नित्य-निरन्तर बड़े आनन्दसे भगवान् श्रीकृष्णके प्रति प्रेम-भक्ति करते हैं, जिससे आत्मप्रसादकी प्राप्ति होती है॥ २२॥✎ 27
अतो वै कवयो नित्यं भक्तिं परमया मुदा।
वासुदेवे भगवति कुर्वन्त्यात्मप्रसादनीम्॥ २२
इसीसे बुद्धिमान् लोग नित्य-निरन्तर बड़े आनन्दसे भगवान् श्रीकृष्णके प्रति प्रेम-भक्ति करते हैं, जिससे आत्मप्रसादकी प्राप्ति होती है॥ २२॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 1.2.22 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 86) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/1/2/22/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (3)