श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 1.18.5

प्रथम स्कन्ध · अध्याय 18 · अथाष्टादशोऽध्यायः

तावत्कलिर्न प्रभवेत् प्रविष्टोऽपीह सर्वतः।

यावदीशो महानुर्व्यामाभिमन्यव एकराट्॥ ५

tāvatkalirna prabhavet praviṣṭo'pīha sarvataḥ|

yāvadīśo mahānurvyāmābhimanyava ekarāṭ|| 5

अर्थ

जबतक पृथ्वीपर अभिमन्युनन्दन महाराज परीक्षित् सम्राट् रहे, तबतक चारों ओर व्याप्त हो जानेपर भी कलियुगका कुछ भी प्रभाव नहीं था॥ ५॥✎ 109

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #109 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

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