श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 1.18.3

प्रथम स्कन्ध · अध्याय 18 · अथाष्टादशोऽध्यायः

उत्सृज्य सर्वतः सङ्गं विज्ञाताजितसंस्थितिः।

वैयासकेर्जहौ शिष्यो गङ्गायां स्वं कलेवरम्॥ ३

utsṛjya sarvataḥ saṅgaṃ vijñātājitasaṃsthitiḥ|

vaiyāsakerjahau śiṣyo gaṅgāyāṃ svaṃ kalevaram|| 3

अर्थ

उन्होंने सबकी आसक्ति छोड़ दी, गंगातटपर जाकर श्रीशुकदेवजीसे उपदेश ग्रहण किया और इस प्रकार भगवान्‌के स्वरूपको जानकर अपने शरीरको त्याग दिया॥ ३॥✎ 109

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #109 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

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