जिस समय ब्राह्मणके शापसे उन्हें डसनेके लिये तक्षक आया, उस समय वे प्राणनाशके महान् भयसे भी भयभीत नहीं हुए; क्योंकि उन्होंने अपना चित्त भगवान् श्रीकृष्णके चरणोंमें समर्पित कर रखा था॥ २॥✎ 109
ब्रह्मकोपोत्थिताद् यस्तु तक्षकात्प्राणविप्लवात्।
न सम्मुमोहोरुभयाद् भगवत्यर्पिताशयः॥ २
जिस समय ब्राह्मणके शापसे उन्हें डसनेके लिये तक्षक आया, उस समय वे प्राणनाशके महान् भयसे भी भयभीत नहीं हुए; क्योंकि उन्होंने अपना चित्त भगवान् श्रीकृष्णके चरणोंमें समर्पित कर रखा था॥ २॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 1.18.2 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 168) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/1/18/2/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)