श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 1.18.19

प्रथम स्कन्ध · अध्याय 18 · अथाष्टादशोऽध्यायः

कुतः पुनर्गृणतो नाम तस्य

महत्तमैकान्तपरायणस्य ।

योऽनन्तशक्तिर्भगवाननन्तो

महद‍्गुणत्वाद् यमनन्तमाहुः॥ १९

kutaḥ punargṛṇato nāma tasya

mahattamaikāntaparāyaṇasya |

yo'nantaśaktirbhagavānananto

mahadguṇatvād yamanantamāhuḥ|| 19

अर्थ

फिर उन लोगोंकी तो बात ही क्या है, जो सत्पुरुषोंके एकमात्र आश्रय भगवान्‌का नाम लेते हैं! भगवान्‌की शक्ति अनन्त है, वे स्वयं अनन्त हैं। वास्तवमें उनके गुणोंकी अनन्तताके कारण ही उन्हें अनन्त कहा गया है॥ १९॥✎ 112

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #112 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

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