भगवान्के गुणोंकी समता भी जब कोई नहीं कर सकता, तब उनसे बढ़कर तो कोई हो ही कैसे सकता है। उनके गुणोंकी यह विशेषता समझानेके लिये इतना कह देना ही पर्याप्त है कि लक्ष्मीजी अपनेको प्राप्त करनेकी इच्छासे प्रार्थना करनेवाले ब्रह्मादि देवताओंको छोड़कर भगवान्के न चाहनेपर भी उनके चरणकमलोंकी रजका ही सेवन करती हैं॥ २०॥
एतावतालं ननु सूचितेन
गुणैरसाम्यानतिशायनस्य ।
हित्वेतरान् प्रार्थयतो विभूति-
र्यस्याङ्घ्रिरेणुं जुषतेऽनभीप्सोः॥ २०
भगवान्के गुणोंकी समता भी जब कोई नहीं कर सकता, तब उनसे बढ़कर तो कोई हो ही कैसे सकता है। उनके गुणोंकी यह विशेषता समझानेके लिये इतना कह देना ही पर्याप्त है कि लक्ष्मीजी अपनेको प्राप्त करनेकी इच्छासे प्रार्थना करनेवाले ब्रह्मादि देवताओंको छोड़कर भगवान्के न चाहनेपर भी उनके चरणकमलोंकी रजका ही सेवन करती हैं॥ २०॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 1.18.20 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 170) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/1/18/20/