श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 1.18.18

प्रथम स्कन्ध · अध्याय 18 · अथाष्टादशोऽध्यायः

सूत उवाच

अहो वयं जन्मभृतोऽद्य हास्म

वृद्धानुवृत्त्यापि विलोमजाताः।

दौष्कुल्यमाधिं विधुनोति शीघ्रं

महत्तमानामभिधानयोगः ॥ १८

aho vayaṃ janmabhṛto'dya hāsma

vṛddhānuvṛttyāpi vilomajātāḥ|

dauṣkulyamādhiṃ vidhunoti śīghraṃ

mahattamānāmabhidhānayogaḥ || 18

अर्थ

सूतजी कहते हैं—अहो! विलोम* जातिमें उत्पन्‍न होनेपर भी महात्माओंकी सेवा करनेके कारण आज हमारा जन्म सफल हो गया। क्योंकि महापुरुषोंके साथ बातचीत करनेमात्रसे ही नीच कुलमें उत्पन्‍न होनेकी मनोव्यथा शीघ्र ही मिट जाती है॥ १८॥

टिप्पणियाँ

  1. *

    उच्च वर्णकी माता और निम्न वर्णके पितासे उत्पन्‍न संतानको ‘विलोमज’ कहते हैं। सूत जातिकी उत्पत्ति इसी प्रकार ब्राह्मणी माता और क्षत्रिय पिताके द्वारा होनेसे उसे शास्त्रोंमें विलोम जाति माना गया है।

    (मुद्रित पृष्ठ 170)

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