भगवान्के परम प्रेमी महाबुद्धि परीक्षित्ने श्रीशुकदेवजीके उपदेश किये हुए जिस ज्ञानसे मोक्षस्वरूप भगवान्के चरणकमलोंको प्राप्त किया, आप कृपा करके उसी ज्ञान और परीक्षित्के परम पवित्र उपाख्यानका वर्णन कीजिये; क्योंकि उसमें कोई बात छिपाकर नहीं कही गयी होगी और भगवत्प्रेमकी अद्भुत योगनिष्ठाका निरूपण किया गया होगा। उसमें पद-पदपर भगवान् श्रीकृष्णकी लीलाओंका वर्णन हुआ होगा। भगवान्के प्यारे भक्तोंको वैसा प्रसंग सुननेमें बड़ा रस मिलता है॥ १६-१७॥✎ 110111
यह अर्थ श्लोक 16–17 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।
तन्नः परं पुण्यमसंवृतार्थ-
माख्यानमत्यद्भुतयोगनिष्ठम् ।
आख्याह्यनन्ताचरितोपपन्नं
पारीक्षितं भागवताभिरामम्॥ १७
भगवान्के परम प्रेमी महाबुद्धि परीक्षित्ने श्रीशुकदेवजीके उपदेश किये हुए जिस ज्ञानसे मोक्षस्वरूप भगवान्के चरणकमलोंको प्राप्त किया, आप कृपा करके उसी ज्ञान और परीक्षित्के परम पवित्र उपाख्यानका वर्णन कीजिये; क्योंकि उसमें कोई बात छिपाकर नहीं कही गयी होगी और भगवत्प्रेमकी अद्भुत योगनिष्ठाका निरूपण किया गया होगा। उसमें पद-पदपर भगवान् श्रीकृष्णकी लीलाओंका वर्णन हुआ होगा। भगवान्के प्यारे भक्तोंको वैसा प्रसंग सुननेमें बड़ा रस मिलता है॥ १६-१७॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 1.18.17 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 170) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/1/18/17/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)