श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 1.18.12

प्रथम स्कन्ध · अध्याय 18 · अथाष्टादशोऽध्यायः

कर्मण्यस्मिन्‍ननाश्वासे धूमधूम्रात्मनां भवान्।

आपाययति गोविन्दपादपद्मासवं मधु॥ १२

karmaṇyasminnanāśvāse dhūmadhūmrātmanāṃ bhavān|

āpāyayati govindapādapadmāsavaṃ madhu|| 12

अर्थ

यज्ञ करते-करते उसके धूएँसे हमलोगोंका शरीर धूमिल हो गया है। फिर भी इस कर्मका कोई विश्वास नहीं है। इधर आप तो वर्तमानमें ही भगवान् श्रीकृष्णचन्द्रके चरणकमलोंका मादक और मधुर मधु पिलाकर हमें तृप्त कर रहे हैं॥ १२॥✎ 110 111

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #110 शब्दोंके बीचका स्थान: कोही → को ही
  • #111 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् को → भगवान्‌को

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