श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 1.18.11

प्रथम स्कन्ध · अध्याय 18 · अथाष्टादशोऽध्यायः

ऋषय ऊचुः

सूत जीव समाः सौम्य शाश्‍वतीर्विशदं यशः।

यस्त्वं शंससि कृष्णस्य मर्त्यानाममृतं हि नः॥ ११

sūta jīva samāḥ saumya śāśvatīrviśadaṃ yaśaḥ|

yastvaṃ śaṃsasi kṛṣṇasya martyānāmamṛtaṃ hi naḥ|| 11

अर्थ

ऋषियोंने कहा—सौम्यस्वभाव सूतजी! आप युग-युग जीयें; क्योंकि मृत्युके प्रवाहमें पड़े हुए हम-लोगोंको आप भगवान् श्रीकृष्णकी अमृतमयी उज्ज्वल कीर्तिका श्रवण कराते हैं॥ ११॥✎ 110 111

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #110 शब्दोंके बीचका स्थान: कोही → को ही
  • #111 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् को → भगवान्‌को

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