भगवत्-प्रेमी भक्तोंके लवमात्रके सत्संगसे स्वर्ग एवं मोक्षकी भी तुलना नहीं की जा सकती; फिर मनुष्योंके तुच्छ भोगोंकी तो बात ही क्या है॥ १३॥✎ 110111
तुलयाम लवेनापि न स्वर्गं नापुनर्भवम्।
भगवत्सङ्गिसङ्गस्य मर्त्यानां किमुताशिषः॥ १३
भगवत्-प्रेमी भक्तोंके लवमात्रके सत्संगसे स्वर्ग एवं मोक्षकी भी तुलना नहीं की जा सकती; फिर मनुष्योंके तुच्छ भोगोंकी तो बात ही क्या है॥ १३॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 1.18.13 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 169) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/1/18/13/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)