श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 1.17.34

प्रथम स्कन्ध · अध्याय 17 · अथ सप्तदशोऽध्यायः

यस्मिन् हरिर्भगवानिज्यमान

इ३ज्यामूर्तिर्यजतां शं तनोति।

कामानमोघान् स्थिरजङ्गमाना-

मन्तर्बहिर्वायुरिवैष आत्मा॥ ३४

yasmin harirbhagavānijyamāna

ijyāmūrtiryajatāṃ śaṃ tanoti|

kāmānamoghān sthirajaṅgamānā-

mantarbahirvāyurivaiṣa ātmā|| 34

अर्थ

इस देशमें भगवान् श्रीहरि यज्ञोंके रूपमें निवास करते हैं, यज्ञोंके द्वारा उनकी पूजा होती है और वे यज्ञ करनेवालोंका कल्याण करते हैं। वे सर्वात्मा भगवान् वायुकी भाँति समस्त चराचर जीवोंके भीतर और बाहर एकरस स्थित रहते हुए उनकी कामनाओंको पूर्ण करते रहते हैं॥ ३४॥

टिप्पणियाँ

  1. ३

    प्रा० पा०—इष्टात्ममूर्ति०।

    (मुद्रित पृष्ठ 166)

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें