श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 1.17.33

प्रथम स्कन्ध · अध्याय 17 · अथ सप्तदशोऽध्यायः

न वर्तितव्यं तदधर्मबन्धो

धर्मेण सत्येन च वर्तितव्ये।

ब्रह्मावर्ते यत्र यजन्ति यज्ञै-

र्यज्ञेश्‍वरं यज्ञवितानविज्ञाः॥ ३३

na vartitavyaṃ tadadharmabandho

dharmeṇa satyena ca vartitavye|

brahmāvarte yatra yajanti yajñai-

ryajñeśvaraṃ yajñavitānavijñāḥ|| 33

अर्थ

अतः अधर्मके साथी! इस ब्रह्मावर्तमें तू एक क्षणके लिये भी न ठहरना; क्योंकि यह धर्म और सत्यका निवासस्थान है। इस क्षेत्रमें यज्ञविधिके जाननेवाले महात्मा यज्ञोंके द्वारा यज्ञपुरुष-भगवान्‌की आराधना करते रहते हैं॥ ३३॥✎ 108

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #108 शब्दोंके बीचका स्थान: यज्ञपुरुष-भगवान् की → यज्ञपुरुष-भगवान्‌की

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