अतः अधर्मके साथी! इस ब्रह्मावर्तमें तू एक क्षणके लिये भी न ठहरना; क्योंकि यह धर्म और सत्यका निवासस्थान है। इस क्षेत्रमें यज्ञविधिके जाननेवाले महात्मा यज्ञोंके द्वारा यज्ञपुरुष-भगवान्की आराधना करते रहते हैं॥ ३३॥✎ 108
न वर्तितव्यं तदधर्मबन्धो
धर्मेण सत्येन च वर्तितव्ये।
ब्रह्मावर्ते यत्र यजन्ति यज्ञै-
र्यज्ञेश्वरं यज्ञवितानविज्ञाः॥ ३३
अतः अधर्मके साथी! इस ब्रह्मावर्तमें तू एक क्षणके लिये भी न ठहरना; क्योंकि यह धर्म और सत्यका निवासस्थान है। इस क्षेत्रमें यज्ञविधिके जाननेवाले महात्मा यज्ञोंके द्वारा यज्ञपुरुष-भगवान्की आराधना करते रहते हैं॥ ३३॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 1.17.33 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 166) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/1/17/33/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
#108 शब्दोंके बीचका स्थान: यज्ञपुरुष-भगवान् की → यज्ञपुरुष-भगवान्की